परमहंसी गंगा आश्रम में जगद्गुरु शंकराचार्य जी का चातुर्मास श्रीमद् देवी भागवत कथा के छठवें अध्याय का दिव्यरहस्योद्घाटन

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परमहंसी गंगा आश्रम में जगद्गुरु शंकराचार्य जी का चातुर्मास श्रीमद् देवी भागवत कथा के छठवें अध्याय का दिव्यरहस्योद्घाटन

गोटेगांव स्थित परमहंसी गंगा आश्रम में पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती जी महाराज का चातुर्मास व्रत पूर्ण श्रद्धा और भक्ति के साथ चल रहा है। प्रतिदिन महाराजश्री द्वारा प्रवचनमाला आयोजित की जाती है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु लाभ ले रहे हैं। इस समय श्रीमद् देवी भागवत महापुराण की कथा हो रही है।

आज की कथा में दसवें स्कंध के छठवें अध्याय का प्रसंग आया। कथा में व्यासजी से प्रश्न हुआ कि
*राजा नहुष को सर्प योनि क्यों मिली?*
*देवराज इंद्र को अपना पद क्यों छोड़ना पड़ा?*

इस प्रश्न का उत्तर देते हुए व्यासजी ने कहा

राजा नहुष तप, बल और सामर्थ्य से इंद्र पद को प्राप्त कर लेते हैं, किंतु अहंकारवश वे देवताओं के ऋषियों को भी अपमानित करने लगते हैं। एक बार उन्होंने महर्षि अगस्त्य को अपने पालकी के वाहक बनने का आदेश दिया। चलते समय अगस्त्य मुनि की गति धीमी हुई तो नहुष ने उन्हें लात मार दी। यह मुनियों का अपमान था, अतः महर्षि ने नहुष को शाप दे दिया कि वे सर्प योनि में गिरेंगे।

वहीं देवराज इंद्र को ब्रह्महत्या का पाप लगने के कारण अपना पद छोड़ना पड़ा। वृत्रासुर वध के बाद वे पापबद्ध हो गए और देवत्व की गरिमा धूमिल हो गई। परिणामस्वरूप उन्हें गुप्तवास करना पड़ा और इंद्रासन रिक्त हो गया।
*महाराजश्री ने कहा कि यह प्रसंग हमें सिखाता है*
अहंकार चाहे कितना भी बड़ा राजा या देव क्यों न हो, पतन का कारण बनता है।
धर्म और मर्यादा से विमुख होकर किया गया कर्म अंततः दुख और पतन लाता है।
इसी क्रम में पूज्य शंकराचार्य जी महाराज ने भक्तों को समझाते हुए कहा कि

कर्म, अकर्म और विकर्म यही जीवन केवास्तविक व्याधि हैं।कर्मक्षय से जन्म का नाश हो जाता है।यदि ब्रह्म की प्राप्ति करनी है तो मन को वश में करना आवश्यक है।
यह मन नर के शरीर से शिखा तक व्याप्त है और हृदय में प्रतिष्ठित होता है। देह का तो बुढ़ापा आता है, परंतु मन का बुढ़ापा नहीं आता।
जिसमें विष्णु का अंत है वही राजा बनता है, इसलिए राजा को विष्णु का स्वरूप माना जाता है।
हर प्राणी अपने कर्मों का बंधन लेकर चलता है। सुख-दुख का भोग इसी जीवन में करना पड़ता है।
धर्म ही वास्तविक सुख का मूल है।
पूर्व जन्म के कर्मों को भोगना ही पड़ता है, उनसे कोई बच नहीं सकता।

महाराजश्री ने कहा कि कथा का यह संदेश है कि अहंकार और अधर्म से पतन होता है जबकि धर्म और मन पर नियंत्रण से मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।

श्रद्धालुओं ने कथा के गहन उपदेशों को सुनकर भाव-विभोर होकर “जय देवी भागवत” और “हर हर महादेव” के उद्घोष किए।

Mb News 7
Author: Mb News 7

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