शायद ही संवारा होगा खुद को बच्चों के बाद, गुजार दी उम्र सारी अपनों के भविष्य के लिए..

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योगेश जावरे – लेखक

पिताओं ने कभी नहीं रखी,
आभार की उम्मीद बच्चों से।
करते रहे अनवरत कार्य अपनों के लिए।
वे ताउम्र घिसते रहे शनैः शनैः स्वयं,
जैसे बहाव से नदी के किनारे घिसते है।

उन्होंने कभी नहीं लिया अवकाश अपने पितृत्व से,
वो निरंतर कार्यरत रहे सूर्य-चन्द्रमा की तरह।
उम्र के साथ गहराती चली गई चिंताएं,
जैसे कृष्णपक्ष में अंधेरा बढ़ता है धीरे धीरे।

शायद ही संवारा होगा खुद को बच्चों के बाद,
गुजार दी उम्र सारी अपनों के भविष्य के लिए।
जैसे निकल जाती है माली की सारी उम्र,
एक ही सुंदर बाग सावरने में।

सच कहूं तो नही मिला आराम पिताओं को,
कभी चिंता से , कभी काम से, कभी कमाने से।
जिस दिन मागेंगे इस सृष्टि के समस्त पिता ,
अपनी सारी चिंताओ का हिसाब,
शायद उस दिन बच्चों के
सात जन्म की दौलत भी कम होगी।

– कवि योगेश योगी
सिवनी (म प्र)

Yogesh Jaware
Author: Yogesh Jaware

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