*”राजा का धर्म और रानी का भ्रम”*
*जब एक राजा धर्म
को वरण करता है
तब उसका राज्य*
देवता भी वंदन करते हैं।
लेकिन जब एक रानी मोह और माया में बहकर निर्णय लेती है, तब इतिहास की धारा तक बदल जाती है।”*
*जनक का नीति-संवाद राम में राजा की छवि:*
जनक बोले: मैं बूढ़ा हो गया हूं राम मैं तुम्हें जो बताने जा रहा हूं वह सुनो
“राम! राज्य का
आधार केवल सेना
नहीं, नीति है। शस्त्रों
से राज्य जीता जा
सकता है, पर हृदय
नीति से ही जीते जाते
हैं।
राजा वही जो सब वर्णों का पोषण करे — ब्राह्मण को शिक्षा, क्षत्रिय को रणभूमि, वैश्य को व्यापार और शूद्र को मान।”
राम ने चरण छूते हुए कहा
“मैं राज्य नहीं चाहता,
केवल सेवा चाहता हूं।
जनक मुस्कुराए
“यही सोच तुझे राज्य
के योग्य बनाती है।”
*राज्याभिषेक की घोषणा और हर्ष का वातावरण:*
राजा जनक ने सभा में राज्याभिषेक की घोषणा की। मंत्रियों को आदेश मिला
“राम का
राज्याभिषेक तुरंत
प्रारंभ हो। नगर
सजाया जाए। धर्म
का राज्य लौट रहा
है।”
*सुमंतजी को विशेष आदेश मिला*
“राम को रथ में महल
लाओ, यह केवल
एक राजा नहीं
धर्म का अवतार आने
वाला है।”
पूरा नगरदीपमालिकाओं से सजा, तोरणद्वार बने, मंगलगान हुआ। प्रजा पुलकित थी।
*लेकिन उसी समय महल के एक कोने में*
*जहां दीप नहीं,वहां एक छाया थीजहां नीति नहीं, वहां मंथरा थी*
*मंथरा और कैकेयी की कुटिल वार्ता इतिहास की दिशा बदलने लगी:*
मंथरा ने रानी कैकेयी को रोका और कहा:
“राज्याभिषेक की
ध्वनि सुनकर हर्षित
मत हो रानी, वह
राज्य तुम्हारे पुत्र
भरत का होना
चाहिए। यह तो केवल
कोशल की साजिश
है राम को राजा
बनाकर तुम्हें
दरकिनार किया जा
रहा है।”
*कैकेयी अचंभित:*
“क्या तू सच कह रही
है, मंथरा?”
*मंथरा (चालाकी से मुस्कुराते हुए):*
“राम के राजा बनते
ही भरत वन भेजदिए जाएंगे, औरआप एक
साधारण रानी बनकर
रह जाएंगी। क्या यही
न्याय है?”
कैकेयी का मोह जाग उठा। उसके हृदय में कर्तव्य और माया के द्वंद्व प्रारंभ हो गया। मंथरा ने आगे कहा: “राजा दशरथ ने तुम्हें
दो वरदान दिए थे
आज मांगो भरत का
राज्याभिषेक और
राम को चौदह वर्षों
का वनवास।”
एक क्षण में जो राज्याभिषेक की रात्रि होनी थी, वह रण की पूर्वपीठिका बन गई।
“धर्म का पथ कठिन
है पर उस परअडिग रहना ही रामत्व है।
नीति के सिंहासन को तात्कालिक लोभ, भय या मोह छिन्न कर सकते हैं — पर सच्चा धर्म हर बार अंधकार में से भी ज्योति ले आता है।”
Author: Mb News 7
Founder










